बहुत से अमरीकियों का ख्याल है कि ट्रम्प को चुनाव में जिन चीज़ों की वजह से जीत मिली उनमें इस विचार की भी बड़ी भूमिका थी कि ट्रम्प, राजनेताओं के विपरीत, अच्छे " व्यापारी" हैं और सौदेबाज़ी की कला उन्हें आती है इस लिए वह अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में वह इस देश का काफी फायदा करा सकते हैं। दूसरे पक्ष के समीकरण बिगाड़ कर उसे घुटने टेकने पर मजबूर करने की कल्पना और ट्रम्प की सौदेबाज़ी की क्षमता दो आधारों पर समझी जाती है। एक गेम आफ चिकन अर्थात बाज़- बटेर की लड़ाई और दूसरे पागल आदमी की थ्योरी है।
गेम आफ चिकन या बाज़ बटेर की लड़ाई की थ्योरी के अनुसार दो पक्ष एक दूसरे से हितों के टकराव की दशा में अपना सारा ज़ोर यह साबित करने पर लगाते हैं कि वह हर स्थिति के लिए तैयार हैं और कुछ भी कर सकते हैं ताकि इस प्रकार के दूसरे पक्ष के मन में भय पैदा करके उसे मैदान छोड़ने पर मजबूर किया जाए।
इस थ्योरी को इस तरह से समझा जा सकता है कि आप एक सड़क की कल्पना करें जिस पर एक समय में एक ही कार गुज़र सकती हो लेकिन उस सड़क के दोनों ओर एक- एक एक दूसरे की विपरीत दिशा में पूरी तेज़ी के साथ चली आ रही है। इस स्थिति में एक ड्राइवर को सड़क छोड़ कर गली में मुड़ने का विकल्प चुनना होगा अन्यथा दोनों कारें टकरा जाएंगी और दोनों को ही नुक़सान पहुंचेगा, जो ड्राइवर डर कर मुड़ गया वह हार गया। स्पष्ट सी बात है अगर किसी कार चालक को यह आभास हो जाए कि सामने वाला ड्राइवर डर रहा है तो निश्चित रूप से वह आगे बढ़ता ही जाएगा।
यही वह तकनीक है जिसे ट्रम्प, चाहे व्यापारी के रूप में हों या राजनेता के रूप में , हमेशा इस्तेमाल करते रहे हैं। उदाहरण स्वरूप पिछले साल की घटना ले लें। अमरीकी राष्ट्रपतियों ने हमेशा उत्तरी कोरियि को परमाणु धमकी देने से परहेज़ किया है लेकिन ट्रम्प ने सीधे सीधे उत्तरी कोरिया को परमाणु हमले की धमकी दे दी। हालांकि उनके सलाहकारों ने उन्हें एसा करने से रोका था क्योंकि यह आशंका थी कि उत्तरी कोरिया धमकी के जवाब में सच में ही अमरीका के ग्वाम द्वीप पर परमाणु हमला कर दे।
गेम आफ चिकन के साथ ही " मैड मैन " की थ्योरी का भी ट्रम्प जम कर इस्तेमाल करते हैं। उनकी कोशिश होती है कि स्वंय को एसा व्यक्ति दर्शाएं जो कभी भी कुछ भी कर सकता है और हर हाल में ताक़त का इस्तेमाल कर सकता है। इसप्रकार से वह गेम आप चिकन और मैड मैन की थ्योरियों का प्रयोग करके अपने सामने वाले पक्ष को घुटने टेकने पर मजबूर करते हैं।
विदेश नीति में " मैड मैन " की थ्योरी के प्रयोग के लिए रिचर्ड निक्सन का नाम लिया जाता है जो सन 1969 से 1974 तक अमरीका के राष्ट्रपति रहे हैं। उनकी रणनीति बहुत सरल थीः सोवियत संघ को यह विश्वास दिलाया जाए कि अमरीका का व्यवहार बेहद आतार्किक और पल पल बदलने वाला हो सकता है। थ्योरा के अनुसार इस विश्वास पर पहुंचने के बाद सोवियत संघ के नेता, शीत युद्ध के बजाए अमरीका में भड़काने से परहेज़ करेगें।
हालांकि ट्रम्प ने अपनी किताब " द आर्ट आफ द डील " में सीधे रूप में इस थ्योरी का उल्लेख नहीं किया है लेकिन उनके व्यवहार और उनकी शैली से यह पता चलता है कि उन्हें इस थ्योरी में पूरा विश्वास है। उदाहरण स्वरूप, पिछले साल मीडिया में रिपोर्ट आयी थी कि उन्होंने सियोल- वाशिंग्टन के मध्य एक व्यापारिक वार्ता में अपने एक वरिष्ठ सलाहकार से कहा था कि वह उन्हें " मैड मैन" और " अप्रत्याशित" व्यक्ति बताएं कि जो कभी कभी समझौते को फाड़ सकता है।
ईरान के बारे में ट्रम्प की नीति विशेषकर हालिया दिनों में अमरीका की ओर से इलाक़े में विमान वाहक युद्धपोत और बम वर्षक विमान भेजने के फैसले को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। एसे हालात में कि जब अमरीका, किसी भी तरह, एक नया युद्ध छेड़ने की पोज़ीशन में नहीं है, ट्रम्प सरकार ने पहले ईरान के साथ युद्ध करने की बात की और जब ईरान पीछे हटता नहीं नज़र आया तो वार्ता की गुहार लगाने लगे और स्विटरलैंड को अपना फोन नंबर भी दे दिया कि वह ईरान को दे दे।
पेन्टागन में ईरानी मामलों के भूतपूर्व प्रभारी और न्यू अमरीकिन सेन्टर के वरिष्ठ सदस्य, एलेन गोल्डनबर्ग, उन दसियों अमरीकी विश्लेषकों में शामिल हैं जिनका यह विश्वास है कि क्षेत्र में अमरीका की नयी गतिविधियां, ईरान को धमकाने और उसके फैसलों को बदलने पर मजबूर करने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं हैं।
बहरहाल, " द गेम आफ चिकन" और " मैड मैन " की रणनीति अभी तक तो ट्रम्प के काम नहीं आयी है। उत्तरी कोरिया के साथ वार्ता, इस देश के परमाणु कार्यक्रम को रोकने में सफल नहीं रही है, वेनेज़ोएला में तख्तापलट का प्रयास विफल हुआ है और ट्रम्प ने अमरीका के भीतर भी जब भी इन दो रणनीतियों को इस्तेमाल करने की कोशिश की, उन्हें विफलता ही मिली है।